बच्चे के जन्म के बाद मां की जिंदगी में कई बदलाव आते हैं। शरीर में बदलाव के साथ मन पर भी असर पड़ सकता है। कुछ मांओं को कुछ दिनों तक उदासी, थकान, घबराहट या बार-बार रोने का मन हो सकता है। लेकिन अगर यह परेशानी लंबे समय तक बनी रहे और रोज के काम या बच्चे की देखभाल में दिक्कत होने लगे, तो यह बच्चे के जन्म के बाद होने वाली मानसिक उदासी की निशानी हो सकती है।

इस समस्या के बारे में लोगों के बीच कई गलत बातें कही जाती हैं। इन बातों को समझना जरूरी है, ताकि मां को समय पर सही मदद मिल सके।

गलतफहमी 1: यह सिर्फ शरीर में होने वाले बदलाव की वजह से होती है

बच्चे के जन्म के बाद शरीर में कई बदलाव होते हैं और इसका असर मन पर भी पड़ सकता है। लेकिन मां की लगातार उदासी का कारण सिर्फ शरीर में होने वाले बदलाव नहीं होते।

कम नींद, बहुत ज्यादा थकान, बच्चे की देखभाल का दबाव, घर की चिंता, अकेलापन और परिवार से कम मदद मिलना भी परेशानी बढ़ा सकता है। इसलिए लंबे समय तक उदास रहने को केवल शरीर में होने वाले बदलाव का असर मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

गलतफहमी 2: अच्छी मां को कभी दुखी नहीं होना चाहिए

मां अपने बच्चे से बहुत प्यार कर सकती है और फिर भी उसे उदासी या घबराहट हो सकती है। मां बनने के बाद नई जिम्मेदारियां आती हैं। नींद पूरी नहीं हो पाती और शरीर भी थका हुआ रह सकता है।

अगर किसी मां को रोने का मन करता है, वह परेशान रहती है या उसे हर समय चिंता होती है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह अच्छी मां नहीं है। ऐसे समय में उसे दोष देने के बजाय उसकी बात सुनना और उसका साथ देना चाहिए।

गलतफहमी 3: यह अपने आप जल्दी ठीक हो जाती है

कुछ महिलाओं को बच्चे के जन्म के बाद थोड़े समय के लिए उदासी महसूस हो सकती है और वह धीरे-धीरे कम हो जाती है। लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता।

अगर मां कई दिनों या हफ्तों तक लगातार उदास रहती है, किसी काम में मन नहीं लगता, बहुत ज्यादा चिंता करती है या बच्चे की देखभाल करना मुश्किल लगता है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर होता है।

गलतफहमी 4: डॉक्टर से बात करने की जरूरत नहीं होती

कई महिलाएं अपनी परेशानी किसी को नहीं बतातीं। उन्हें लगता है कि यह समय के साथ ठीक हो जाएगी। लेकिन अगर परेशानी बढ़ रही है, तो मदद लेना सही कदम है।

डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करने से मां को अपनी परेशानी समझने और उसे संभालने में मदद मिल सकती है। जरूरत के अनुसार बात करके सलाह लेना, मन की परेशानी के लिए इलाज लेना या डॉक्टर की सलाह से दवा लेना जैसे तरीके अपनाए जा सकते हैं।

अगर मां बच्चे को अपना दूध पिला रही है, तो किसी भी दवा को बिना डॉक्टर की सलाह के नहीं लेना चाहिए।

गलतफहमी 5: अपनी परेशानी बताने से बच्चे को नुकसान होगा

अपनी परेशानी के बारे में बात करना गलत नहीं है। किसी भरोसेमंद व्यक्ति से अपनी भावनाएं साझा करने से मां को सहारा मिल सकता है।

अगर मां की मानसिक परेशानी का इलाज न हो, तो उसकी अपनी सेहत और बच्चे की देखभाल पर असर पड़ सकता है। इसलिए मां को अपनी बात खुलकर बताने का मौका मिलना चाहिए। परिवार के लोगों को भी उसकी बात समझने और बिना दोष दिए उसका साथ देने की कोशिश करनी चाहिए।

किन लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए?

अगर मां लगातार उदास रहती है, बार-बार रोती है, बहुत ज्यादा चिंता या डर महसूस करती है, किसी काम में मन नहीं लगता, खुद को बेकार समझती है, बहुत थकी रहती है या बच्चे की देखभाल करने में परेशानी महसूस करती है, तो डॉक्टर से सलाह लेना अच्छा रहेगा।

अगर खुद को नुकसान पहुंचाने या जान लेने के विचार आएं, तो तुरंत चिकित्सकीय मदद लेनी चाहिए।

निष्कर्ष

बच्चे के जन्म के बाद होने वाली मानसिक उदासी किसी मां की कमजोरी नहीं है। इसका यह मतलब भी नहीं है कि मां अपने बच्चे से प्यार नहीं करती। लगातार उदासी, चिंता, डर और थकान को केवल सामान्य थकावट मानकर छोड़ना सही नहीं है।

मां की बात ध्यान से सुनना, उसे दोष न देना और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है। समय पर सही मदद मिलने से मां अपनी परेशानी को बेहतर तरीके से संभाल सकती है और अपने बच्चे की देखभाल भी अच्छी तरह कर सकती है।

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